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Mahatma Gandhi

25 जुलाई 1924 · इतिहास में आज

Dramatized

येरवदा, 25 जुलाई। अगले हफ्ते की तारीख़ मुझे सता रही है। 1 अगस्त। 'यंग इंडिया' का वह अंक जो मेरे अंदर से निकलेगा, बाहर की आग को ठंडा करने की कोशिश करेगा। मैं अपनी कोठरी में चरखा घुमाता हूँ, पर आज धागा बार-बार टूट रहा है। गुस्सा? नहीं, धैर्य की परीक्षा। मेरे साथी कहते हैं: 'बापू, आप तो जेल में हैं, लोग क्यों सुनेंगे?' मैं मुस्कुराता हूँ — मेरी आवाज़ नहीं, मेरा चुप रहना बोलेगा। वह चुप्पी जो हिंसा को बेबस कर देती है। मैंने आज एक नियम और बनाया: रोज़ सुबह चार बजे उठकर गीता का एक अध्याय, फिर चरखा, फिर वह पत्र जो मुझे लिखना है। कलम मेरी, कागज़ सरकार का। मज़ेदार बात है — वे मुझे रोकने के लिए यहाँ रखते हैं, और मैं उन्हीं की दीवारों से आईना बनाता हूँ।

Explain more

1 अगस्त 1924 को मैंने 'यंग इंडिया' में एक लेख लिखा जिसमें खिलाफत-स्वराज आंदोलन के भविष्य पर विचार किया। यह मेरे जेल में रहते हुए लिखा गया एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ था, जिसने अहिंसा के मार्ग को दोहराया।

Why it matters

सत्ता आपको चुप करा सकती है, पर आपकी नियमित दिनचर्या — वह आपकी असली आवाज़ बन जाती है। जेल की कोठरी भी आश्रम बन सकती है, बशर्ते आप अपने समय पर राज करें।

Try today

आज एक काम जो आप टाल रहे हैं, उसे नियमित समय पर करें। चाहे दस मिनट ही सही। देखिए, वह समय आपका होता है या नहीं।

What is true / dramatized: Dramatized. Educational entertainment — not a primary historical source.

गांधी की येरवदा जेल डायरी और पत्र, जुलाई-अगस्त 1924; 'यंग इंडिया' अगस्त 1924 अंक

Difficulty: medium · ~4 min

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